My New Poem ...!!!
गिराया है वक़्त ने हालात की बुलंदियों से
तो क्या..? फल कुचलने पर ही तो बीज़ भी
अगली फसलों के लिए खुद ही दफ़्न होते है
हम तो आज भी अपने हुनर में दम रखते है
उड़ जाते है रंग लोगों के जब हम मेहफ़िल
में अपने कमालके क्लाम़ से कदम रखते हैं
हर लफ़्ज़ अपने मायने-औ-मक़ाम रखते है
सौ आसान हरगिज़ नही लफ़्ज़ों से खेलना
पर हम भी अपना हुनर बा-कमाल रखते हैं
हर लफ़्ज़ की तासीर को हम खूब परखते है
हर अल्फ़ाज़की नफ़्सको भी टटोलते है तभी
हर “रुँह”की गहराइयोंको भी हम छू लेते है
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