My New Poem ...!!!
जब पता ही है कि
बेशक इल्जाम मुझपर ही आना है
तो क्यों न गुनाह ही कर लिया जाए ...
काफ़िर इस ख़यालको ही आज़मा
लिया जाए..
पारसाँ पीने दे मस्जिद में बैठ कर
बेख़ौफ़ या..
जगह एसी बता जहाँ तू नहो।
-ख़याल दूरसत है यह भी
पर गुनाह भी लाज़मी है जनाब..!!