आज के हालात पर पेश है एक ग़ज़ल🙏🙏
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कुर्सियां सियासतदारों की बेफिक्र चैन से नींद भर सोती रही
बस्ती बेकसूरो की सियासत की आग से रात दिन जलती रही
जुल्मों की चिंनगारी दर्द के फसाने फुर्सत की कलम से लिखती रही
इंसानियत कांच के टुकडों की तरहा कैसे गली गली में बिखरती रही
अपना कौन है कौन पराया किस जाति धर्म का किसकिस बस्ती मे
बन्द कमरों में बैठकर सियासतदारों की पल पल गिनती चलती रही
मज़हबी मंजर में इंसान को नही पहचान रही बहशी हैवानियत
राजनेताओं की हमदर्द मरहमी तकरीरें खूब चलती रहीं
इंसानियत चीख चीख का रो रही है सडक पर जलता वतन देखकर।
आवाज उठाई इंसाफ की जिस शख्स ने झूठी सियासत दम भरती रही
झ्स खुशहाल देश में क्यों स्वार्थ से नफरत की आग लगाते हो
इतिहास गवाह है देशद्रोहियों के कर्म से वतन की तकदीरे बदलती रही