My Extremist Poem...!!!
सोचता था दर्द की दौलत से,
एक मैं ही मालामाल हूँ
देखा जो ग़ौर से तो,
हर कोई रईस निकला...
गौर-तलब है यह भी कि
जिसे जाना नादाँ-ए-ज़हन...
बेशाँखता वै भी शाँतिर निकला
एक हम ही रफ़ीक-ए-अदब
“रुँह”-ए-सर ज़मींमें शाकी
बाक़ी हरकोई राहगीर निकला.।