आज बात नही कोई
तेरी खामोशी भरे साथ की जरूरत है ।
अब शिकायते नही करनी
ना आशु को बाहाना है ,
तेरे साथ खुशी से बीते थे वो दो पल की जरूरत है ।
जूठी मुश्कान की ना कोई परवाह जहा
ना कोई नियमो का बंधन हो,
तेरा हाथ थामे भी आज़ाद जहा में वो आसमान की जरूरत है ।
चाहे नदी का किनारा हो, या दूर कही उस पत्थर पर
यूही बिना मतलब के गुजर जाए वो शाम की जरूरत है ।
દીપ્તિ ઠકકર 'માહી'