अब मैं पिता की तरह
बैठना सीख गया हूँ,
उनकी तरह पुराने गीत
गुनगुनाने लगा हूँ।
उनकी तरह चिलम नहीं पीता
पर धुआँ उड़ा सकता हूँ,
उन्हीं की तरह
आकाश में झाँकता हूँ,
खिड़की-दरवाजे खोलता हूँ।
अब मैं पिता की तरह
उदास बैठना सीख गया हूँ,
सब बातों को संक्षिप्त कर
तीर्थों की बात करने लगा हूँ।
अब मैं पिता की तरह
लाठी पकड़ कर चलने लगा हूँ,
दाँत दर्द, पीठ दर्द,कमर दर्द
सबकी शिकायत करने लगा हूँ,
लम्बी-चौड़ी कहानियां कहने लगा हूँ,
अब मैं पिता की तरह हो गया हूँ।
**महेश रौतेला