वो कहता था की कार के शीशे को निचे उतार कर दुनिया देखा करो , क्या पता शायद कुछ मिल जाए . मुझे कभी कार की बंध खिड़की पसंद नहीं आयी , में इसे भी एक खिड़की ही कह रही हूँ , क्योंकि उसके बहार एक दुनिया खुली पड़ी है जिसे में पढ़ रही होती हूँ . ठंडी हवाएं आ कर जब मुझे छू कर गुज़र जाती है तब , बालो को हवा में उड़ाती है तब , चेहरे की चमड़ी को खींचती है तब और ज्यों की त्यों सं सं करती गुज़रती है तब मैं ने जो महसूस किया है वो सबसे अलग है. और उसकी बात फिर याद आती है , फिर एक बार लगता है वो मेरे साथ और पास है. फिर एक हलकी सी मुस्कान मेरे चेहरे को छूती हुयी कुछ मेरे पास छोड़ जाती है , किसी रूहानी स्पर्श जैसा...