अपनी खिड़की
अपनी खिड़की
स्वयं ही खोलनी है,
अपना आसमान
खुद ही खोजना है।
क्षितिजों की लाली में
नहा-धो
अपनी दहलीज पर
बार-बार आना है।
धूप-छाँव के साथ
हँसते-रोते
गहरी उम्मीद में आ जाना है,
बातों को बात समझ
बार-बाल पलटना है।
अपनी खिड़की
स्वयं ही खोल
उजाले तक झाँकना है।
*महेश रौतेला