My New Poem ...!!!
फ़कत रेशम-सी थी दरमियाँ गाठें
प्यार से जरा-सा ही खोल लेते तुम
हँस के ज़रा-सा ही मुश्कुरा देते हम
फ़ासला दूरि-नज़दीकीका भी था कम
आन की शानसे जरा-सा उतर जाते तुम
जीदकी देहलीज से कुछ आगे बढ़ते हम
ग़र शिकायत दिल मे थी तो बोलते तुम
बेसबब ज़रा-सा लौट के मना लेते हम
शिकवे-गिले तौ अलामत है मोहब्बतमें
रुठना-मनाना भी अमानत है मोहब्बतमेँ
बात भी तो ज़रा-सी ही थी अख़्तिलाफ़
की नाज़ुक दौर भी इतनी संगीन ना थी
ऑधियाँ पर ग़लतफ़हमी की कुछ इस
क़दर अफ़वाहों की फ़िज़ाओं से उठी
कांतिलाना ख़यालोंका ग़ुबार एसा उठा
कि फिर तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम।
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