My New Poem ... !!!!
ग़ैर तो ग़ैर होते है
ख़ामोश ही रहते हैं
अपनों की अपनापन
की हदों से परे होते हैं
रिंदों-से बने फिरते हैं
में-पन में डूबे रहते हैं
दर्द से दूर ही रहते है
हंसते भी तों जूठी हंसी
ग़ैर के नक़ाब में सजते हैं
पर लाठी क़ुदरत की जब
पड़ती आसमान से हस्ती
इनकी ज़मीन पे आ गिरतीं है
हक़ीक़त फिर दिखाई देती है।
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