My New Poem...!!!
रूह में मैने उतारा उसको ,
सच्चाई के साथ ।
घाव भी उसने दिया है पूरी
गहराई के साथ ।
परवाज़ ख़्यालों कि दोहरातीं है
ख़्वाब थे जो हसीन ।
वनाँ ज़हन के किवाड़ तो अक़्ल की चाबियों से खुलते ।
दर-औ-दिवारें दिल की धड़कती दिवानग़ी-ए-मोहब्बत में।
रग्बत-औ-सोहबत गर ना होती
इन्सानी जीदगीं में।
ना फ़लक ना चाँद ना तारें होते
रब के बनाए इस जहाँ में।
रब्बूबियत खुद भी बसीं रहतीं है
अपने महबूब की दिवानगीँ में।
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