कलयुग
चाहा था उसने, जीवन में उसके असंख्य फूल खिले;
कौन आखिर चाहता है, खुदको पत्थर और कांटे मिले !
उसने मांगी थी अपनो से छोटी छोटी, थोड़ी खुशी ;
बदले में मिली उसे, सिर्फ बेरुखी और ख़ामोशी ।
कोमल दिल उसका चाहता था बेशुमार प्यार;
उसे न पता था, इस दुनिया में, चलता है सिर्फ व्यापार ।
टूट गया वो नाज़ुक दिल, जब मिली न प्यार की मंज़िल ।
कहां पता था उस, यह कलयुग है, यहां होते हैं पत्थर जैसे दिल;
तोड़ के औरोंके के दिल, और जज्बात लोग बसाते है खुद के लिए महफ़िल
कलयुग में शायद ऐसे ही मिलती है उन्हें, अपनी मंज़िल ।
Armin Dutia Motashaw