आग
दिल की आग न पानी बुझा सकी, न आंसू
दोनों बहते गए; इतने बहे के आखिर सुक गए !
न दर्द कम हुआ न अगन, दोनों बढ़ते ही रहे
प्यारमें, जुदाईमें, न जाने हमने कितने दर्द झेले
इंसान प्यार क्यों करता है या उसे प्यार क्यों हो जाता है ???
जवाब नहीं है कोई मेरे पास; कोई तो मुझे बताए !!
जानू मैं, बस रोक सकते नहीं हम यह एहसास ।
तो, रुकेगी फिर कैसे, यह दिल की आग !!!
Armin Dutia Motashaw