My New Poem...!!!
मुश्किल है दौर इतना
और उम्र थक गईं
बेटियाँ बेटियाँ ना रही
इन्सान हैवान-से बन गए
सिफँ फ़ुल नौँचने से जी
नही भरता ख़ाक बनाके छोड़े
सिक्का चला ना-मर्दों का
ज़ालिम होना गर्व बन गया..
बाजार में हमने पूछा था
कि इंसानियत कहाँ मिलेंगी
सबने हंसते हुए कहा कि
वो तो कब कि मर गईं