इंतज़ार
करते रहे हम इंतज़ार तुम्हारा
गुजरे लम्हे फिर ना गुज़रे
आँखो में तो भरे थे बादल
फिर भी क्यों वो ख़ाली निकले
खुशबू चाँद ,किरण, औ हवा, में
हर शे में बस तुम्हें तलाशा
पर जब झाँका दिल के दरीचां
वहाँ हर अक़्स में तुम ही निकले
गुज़रे वक़्त का साया है तू
फिर भी निहारुं राह तुम्हारी
दीप जलाए अंधेरे दिल में
तू इस राह से शायद निकले
बिखर चुकी हूँ कतरा- कतरा
अब तेज़ हवाओं से डर कैसा
फिर भी दिल मासूम ये सोचे
कि यह तूफ़ान ज़रा थम के निकले !!#साया संग्रह से .........