"आत्मकल्याण और जीवनोत्कर्ष की दिशा में आशाजनक प्रगति तभी संभव हो सकती है, जब उस दिशा में बढ़ने के लिए आशाजनक प्रेरणा और प्रकाश प्राप्त हो सके। यह प्रेरणा और प्रकाश केवल सत्साहित्य के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि सत्साहित्य से संपर्क स्थापित करके ही वह विवेक विकसित किया जा सकता है, जिसके द्वारा जीवन में आने वाली गुत्थियों को सुलझाया जा सके।"