अग्नि परीक्षा [ कविता ]
बालपन से सिर्फ सुना किया
राधा ,मीरा, सीता, अहल्या की
नानी-दादी से किस्से- कहानियाँ ।
आनंदित हो जाती थी सुनकर
न सोचा, न तर्क किया कभी
बस मौन रहकर सुना किया।
सीता की हो अग्नि परीक्षा,
या हो अहल्या का शिला श्राप।
मीरा ने क्यों विष पिया ?
चाहे हो राधा का विलाप।
बुद्धि विवेक न थी मेरी
बाल्यावस्था में अकल थी थोड़ी।
प्रौढ़ावस्था में मैं जब आई,
चिंतन मनन को विवश हुई।
क्या अग्नि परीक्षा अब नहीं होती?
या अहल्या सी छली नहीं गई कोई,
यथार्थ में भी विष पी रही मीरा,
घर-घर में जी रही है वीरा।
अबला थी तब भी वो शक्ति,
आज सबला बनने की चाह में
कितनी अग्निपरीक्षा है वो देती।
बच्चों के लिए कभी मौन रहकर,
तो कभी मानमर्यादा को ढ़ोती ।
मिशाल कायम करने की चाह में,
खुद संघर्ष कर सक्षम बन पाती।
चाहत की परवाह किसे,
स्वयं ही जीवन ताना-बाना बुनती।
कलयुग की यह व्यथा हमारी,
इंद्र सा छली, रावण सा कपटी।
मिल जाते हैं हर डगर-गली ,
कहॉं से लाएॅं राम-लखन, केशव ?
कलयुग की व्यथा हुई बड़ी /
सीता ,उर्मिला, मीरा, राधा,
मिलेंगी हर घर - ऑंगन में यहीं ।
''सम्मान देकर, सम्मान है पाना''
ले शपत, पौरुष तब आगे बढ़ना।
अग्नि परीक्षा है अब तुझे देनी ,
दुर्गा ,काली ,लक्ष्मी से पूर्व
समझ पुत्री ,वधु ,स्त्री ,जननी /
देवी पूज, शक्ति करता प्राप्त
नारी शक्ति की पूजा ही नहीं मात्र /
कदम-कदम पर देकर साथ ,
इंसान समझने का संकल्प ले आज /
--------- अर्चना सिंह जया