*रूठी किस्मत*
बुझदिल तो नहीं थी तुम
फिर भी यूँ तन्हा कर गयी
कब आओगी लौटकर
मेरी किस्मत मुझसे रूठ गयी
मैंने कितने खत भेजे
तुम बखुबी जानती हो
फिर भी एक पैगाम न आया तुम्हारा
हर खिलती सुबह के साथ
तुम्हारा इंतजार आंखोमें लिए
राह तकती हू
हर ढलती शाम के साथ
तुम्हारे ख्वाब आंखों में सजाये सोती हूँ
बरसों बीत गए तुमसे मिले
अब तो आ जाओ
मुझसे मिलने सारे शिकवे मिटाने
दो पल के लिए ही सही
लेकिन मुझसे मिल तो लो!
- ©मितवा