मज़हब से मरहम नहीं होता है ज़ख्म पर
जो मज़हबी लड़ाई में मिला है जिस्म को
मिटेगी खाल , मिट जाएगी रूह भी तेरी
न फ़लक पूछेगा न जहन्नम को परवाह होगी
कि तेरा मज़हब क्या है !
न ज़मीन याद रखेगी न आग को खयाल होगा
कि तेरा मज़हब क्या है !
बाज नोच खाएंगे , न एक बार को सोचेंगे
कि तेरा मज़हब क्या है !
समुद्र निगल जाएगा , नहीं पूछेगा तुझसे
कि तेरा मज़हब क्या है !