लिखती हूं आज जो भी ;
कुछ अधूरा सा लगता है सब ।
जैसे की अपने ही जिंदगी का प्रतिबिंब लगता है ।
ये सोच है मेरी या हकीकत ?
क्या सच मे कविता और जिंदगी में अधूरापन है ?
क्या इसे भी सिर्फ तेरा ही इंतज़ार है ??
नाही कविता पूरी हुई : नाहि जिन्दगी ।
क्या ख़्वाब भी तेरे बिना युही बिखर जाएंगे ??
क्या यही है तकदीर की सच्चाई ?!?!
Dr.Divya