राधा और कृष्णा ( प्रेम की पूजा )
प्रेम के पूरक स्वरूप की प्रेरणा देते हैं
लेकिन जो प्रेम की नसीहत इनकी देते हैं उनके प्रेम की गहराई को जान पाना किस के बस की बात हैं.
जब तक प्रेम था सो प्रेम रहा और जब से प्रेम इश्क़, मोहब्बत और लव में तब्दील हुआ सो धोखा ही हुआ हैं... इसके चलते लोग प्रेम में फ़र्ज़ी हो गये... इस प्रेम की परिभषा से अनभिज्ञ हो चुके हैं.... इसीलिए उन लोगों से अनुरोध हैं प्रेम अलग हैं इसे इश्क़, मोहब्बत और लव से ना जोड़े क्योंकि कृष्ण और राधा बनना किसी के बस की बात नहीं हैं... प्रेम पूजा हैं एक दूसरे के प्रति... इश्क़, मोहब्बत और लव का अंत सिर्फ वासना हैं... ये प्रेम की उपासना नहीं हैं...
कृपया उन प्रेमियों से विनम्र अनुरोध हैं अपने इस इश्क़ की परिभाषा या तुलना इस पवित्र प्रेम से ना करें...
इश्क़, मोहब्बत और लव में फरेब हैं धोखा हैं एक दूजे के प्रति पूजा नहीं हैं... ???