अपना
वो कभी तो, एक जमानेमे था अपना;
जो बन गया है आज रहे कर, बस एक सपना ।
वो घर, जिसे समझ बैठे थे हम, पूरे दिल से अपना ;
सच तो है, वो कभी भी था ही नहीं अपना ।
हम ही मूर्ख थे जो हमेशा से, दिलसे माना उसे अपना ।
हां, बड़ी कड़वी है , पर सच्च है यह बात ;
सच्चाई जान के लगता है एक भयानक आघात;
देर से, पर समझमें आ गई, यह कड़वी पर सच्ची बात !
ऐसी ही होती है मात पिता के जाने के बाद, अपनी घात
यही होती है, बिचारी बेटियों, लड़कियों की औकात !
Armin Dutia Motashaw