हूँ तन्हा तो निकलना छोड़ दूँ क्या,
मैं सूरज हूँ चमकना छोड़ दूँ क्या.
बुझूंगा एक दिन ये जानता हूँ,
मगर इस डर से जलना छोड़ दूँ क्या.
नहीं रहता है वो ये जानकर मैं,
गली से भी गुज़रना छोड़ दूँ क्या.
मैं भाता तो नहीं हूँ आईनों को,
तो मैं सजना संवरना छोड़ दूँ क्या.
अगर क़िस्मत में बर्बादी लिखी है,
तो मैं क़िस्मत बदलना छोड़ दूँ क्या.
अगर उम्मीद ने छोड़ा है दामन,
इरादों से भी लड़ना छोड़ दूँ क्या.
समंदर गर नहीं हूँ मैं हूँ दरिया,
किनारों पर मचलना छोड़ दूँ क्या.