आज एक सहेली से मिली
अपनी कुछ कविताएं सुनाई ओर कुछ पेज भी दिखाएं.
तो वो बोली क्या री तु भी ये कोई टाइम है कविता ये
सुनाने का चल ना कोई घर की बाते करते है.थोड़ी देर
में उसे निहारती रही फिर पूछा.. तो बोल क्या बाते करनी
है. ओर सामने मैने कुछ पुरानी फोटो एल्बम रख दी.
उसने वो जट से उठाई और देखने लगी , ओर सब किस्से
याद करने लगी .तब मैने चुपके से सब फोन में टाइप कर
लिया. कुछ देर बाद वो बोली तु क्या कर रही है?
फिर मैने वहीं सब सुनाया जो वो फोटो देख कर बोली थी
वो तो बस मुझे देखती रही और बोली तूने तो बहुत सुंदर
कविता बना दी , तब मैने कहा ये मेरी कविता नहीं
तेरी वो बाते है जो इस एल्बम में थी .बस मैने तो उसे
सब्दों की माला बना दिया तो बन गई कविता.
तब से वो भी अपनी जिंदगी के कुछ किस्से लिखने
लगी है..ओर आज हम फिर से एक पक्की वाली सहेली
बन गए है..[ ये कविताएं कुछ अल्फ़ाज़ नहीं होते
वो तो हमारे दिल का आइना होते है..] Manda...