मनचली शाम
तेरे प्यार में जो ढली थी
वो शाम कितनी मनचली थी।
तेरे छुअन की तपिश थी
और मोम सी मैं पिघली थी।
तेरी बेकाबू धड़कनों से
जब मेरी धड़कनें मिली थी।
तेरी बहकी बहकी साँसों में
जब मेरी साँसें भी उलझीं थी।
तेरी आँखों की शरारत से
जब मेरी पलकें झुकीं थी।
बातों बातों में जो तुमने कही थी
मेरे होंठों पर प्रीत की वो हँसी थी।
तेरी बाँहों के आलिंगन में
अपने प्यार की दुनिया बसी थी।
तेरी मोहब्बत की बारिश से
मेरी आँखों में इश्क की नमीं थी।
आधे से तुम थे आधी सी मैं थी
पूरे होने में कुछ कमी सी थी।
वो शाम कितनी दिलनशीं थी
बरखा जब बादल संग चली थी।
✍? शिल्पी सक्सेना