अहंकार
मोहन और राकेश नामक दो मित्र आपस में अहंकार के विषय में चर्चा कर रहे थे। मोहन ने इसे समझाने के लिए एक उदाहरण दिया, जब भी आंधी, तूफान अपनी तीव्र गति से आता है तो धरती पर बहुत विनाश होता है और बडे बडे पेड़ पौधे, मजबूत मकान इत्यादि धराशायी हो जाते है परंतु दूबा ( एक प्रकार की घास ) एवं बेलपत्ती का पौधा ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी सुरक्षित रहते है। इसका कारण तेज हवा के झोंकों में इनका झुक जाना है और हवा के थपेडे इनके उपर से निकल जाते है जबकि मजबूत तने के वृक्ष और आधुनिक तकनीक से बने सीमेंट, लोहा, ईटों से निर्मित मकान धराशायी हो जाते है। वे इस तूफान का अपनी मजबूती से मुकाबला करने की क्षमता की भूल करते है और अपना अस्तित्व समाप्त कर लेते है। हमें अपनी क्षमताओं का सही आकलन करना चाहिए और यदि परिस्थितियाँ विपरीत हो तो हमें झुक जाना चाहिए और सही वक्त का इंतजार करना चाहिए यदि हम अहंकारवश ऐसा नही करेंगें तो अपना ही नुकसान करके अपने ही अस्तित्व पर संकट बुला लेंगे।