नए हैं पत्ते, नई हैं कलियाँ,
नया सवेरा महकती गलियाँ,
ये ओस लगती हैं जैसे मोती,
कहूँ प्रिये क्या जो पास होती,
है कोयलों को गुमान खुद पर,
उन्हें मुहब्बत का जाम देना,
जो काग छेड़े हैं तार मन के,
व्यथाएँ दिल से गुजरती होंगी,
सजल नयन डबडबाती आँखें,
पिया मिलन को तरसती होंगी।।
-राकेश कुमार पाण्डेय"सागर"