चलो माना मैंने ज़ुबान से इज़हार नहीं किया,
मगर क्या मेरी नज़रें तुमसे कुछ कहती नहीं थी।
क्या तुम्हारे नजदीक आने से बढ़ती मेरी बेचैनी को, तुमने कभी महसूस नहीं किया। क्या कभी ऐसा नहीं लगा, कि मैं तुम्हें ही ढूंढती हूँ। क्या कभी झुकी निगाहों में,
खुद का अक्स देखने की चाहत नहीं हुई। क्या कभी मेरी खामोशियों का शोर, तुम तक नहीं पहुंचा।
माना मैं नहीं कहती कुछ, मगर क्या तुम्हारा दिल मुझसे कुछ कहना नहीं चाहता।
#रूपकीबातें