एक नया सवेरा
हिम्मत सिंह नाम का एक व्यापारी था जो अपनी एक मात्र संतान के लिए अच्छी व सुयोग्य वधु की तलाष कर रहा था। एक दिन वह अपने व्यापार के सिलसिले में एक षहर की ओर जा रहा था तभी षाम का वक्त हो गया और अंधेरा घिर आया। वह निकट के गांव में पहुँचा और पता करने पर उसे मालूम हुआ कि वहाँ पर रूकने के लिए कोई धर्मषाला या सराय नही है। वह इलाका काफी खतरनाक माना जाता था और अक्सर डाकू वहाँ से आया जाया करते थे। वह विकट परिस्थिति में उलझ गया था। उसे आगे और पीछे आने जाने में खतरा था जिससे गांव वालों ने आगाह कर दिया था। उसके इस वार्तालाप और चिंता को एक लडकी भांप गयी और उसने आकर उससे निवेदन किया कि आप आज रात हमारी झोपडी मे विश्राम कर ले। हिम्मत सिंह ने ऐसा ही किया और उस लडकी एवं उसके परिवार के प्रति आभार व्यक्त करता हुआ रात्रि विश्राम के बाद सुबह अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गया।
हिम्मत सिंह को एक माह के बाद अचानक ही याद आया कि वह मोहरों की एक थैली उसी झोपड़े में जल्दबाजी में भूलकर आ गया है। यह ध्यान आते ही वह वापिस उस स्थान पर पहुँचता है और झोपडी में अंदर आते ही लडकी की माँ ने उसे पहचानते हुए कहा कि भईया बहुत अच्छा हुआ कि आप आ गये। आपकी मोहरों की थैली यही रह गयी थी। हमारे पास आपका कोई पता ठिकाना नही होने के कारण हम इसे आप तक भिजवाने में असमर्थ थे आपकी वह धरोहर मेरी बेटी कल्पना के पास सुरक्षित रखी है। उसकी बेटी ने आकर वह थैली वैसी की वैसी हिम्मत सिंह को सौंप दी। इस ईमानदारी से हिम्मत सिंह बहुत प्रभावित हुआ और उसने लडकी की सुंदरता, गुणों एवं उसके व्यवहार को देखते हुए अपने पुत्र का विवाह उससे करके उसे अपने घर की पुत्रवधू बना लिया।