हक नहीं है मेरा तुझपे, फिर भी जताना चाहतीं हुं ।
बातें कईं है करनी तुझको, पर चुप रहना मैं चाहतीं हुं ।
राहों में अकेले साथ तेरे, मैं यूहीं चलना चाहतीं हुं ।
ख्वाहिशे कईं है तेरी मुझसे, पर मजबूर मैं बनना चाहतीं हुं ।
हक जो तुं जताते हो मुझपे, में भी देना चाहतीं हुं ।
दिल हो सिर्फ मेंरे तुम, सिर्फ अपना रखना चाहतीं हुं ।
खुद ही खुद की मस्ती में ,मै यूहीं खोना चाहतीं हुं ।
चाहें कहें कोई खुदगर्ज मुझको, मैं सिर्फ दिल की सुननां चाहतीं हुं ।