मातृभूमि:
मातृभूमि का कण-कण कहता
आरोहण हो दिव्य तुम्हारा,
नभ तक पहुँचे दृष्टि तुम्हारी
क्षण-क्षण जीवनदायी हो।
गंगा जैसा मन बहता हो
हिमगिरी जैसे जन ऊँचे हों,
सूरज जैसी आभा में
जगमग सबका मुखमण्डल हो।
अनन्त समय की व्यापकता में
मृदु मुस्कान तुम्हारी हो,
न्याय के दिव्य चक्र पर
खिला-खिला मन बैठा हो।
अथक पुण्य के कर्मों से
जीवन की सांस बनी हो,
वीर भाव में विजयी है विश्व
यह शाश्वत ज्ञान हमारा हो।
मातृभूमि का कण-कण कहता
सबसे बनता मान महान,
युग-युग तक जन-जन में
बहता सन्तों का सुरभित ज्ञान।
प्रिय भाव से एकबार तुम
मातृभूमि को करो प्रणाम,
जर्जर प्राणों में भर दो
नयी शक्ति का शाश्वत ज्ञान।
**महेश रौतेला