लघुकथा शीर्षक-जीवनसाथी
सुनो ,हेमा जी !”अब बस करो ये उपवास करना छोड़ दो, एक तो डायबिटिक हो दूसरा ब्लड प्रेशर कहीं गिर गिरा पड़ीं चक्कर खाके तो करवाचौथ धरी की धरी रह जायेगी।”
देखो जी !!”इस व्रत के विषय में मत बोला करो ,पूरे पचास साल से रह रही हूँ ।”
ठीक है ,”पर अब लंबी उम्र मत माँगना अब इस जीवन से मुक्ति चाहिए ।”
हरे राम !हरे राम !”सबेरे -सबेरे कैसी अशुभ भाषा बोल रहे हो जी..
“सठिया गए हो आप!”
“व्रत भी रखूंगी आपकी लंबी उम्र की प्रार्थना भी करूँगी, जब तक इस शरीर में चेतना है आपका प्यार मुझमें बसा ही रहेगा ।”
“अच्छा चूड़ियाँ पहन लो बाहर बैठा है ,चूड़ी वाला ।हाथों में मेहँदी, पैरों में पायल और महावर लगा कर जब चलोगी तो लगेगा घायल हिरनियां अपने मतवाले हिरन से मिलने जा रही है ।”
चूड़ियाँ!!” इन झुर्रीदार हाथों में ,मेहँदी सूखी हथेली में क्या लगाऊं, सब कहेंगे ;बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम “।
तुम!!” अभी भी मेरी वही हेमा हो जिसके गालों पर श्वेत लट सूखी सेवई सी, ये झुर्रियाँ नहीं मेरी प्राण लच्छेदार पराठे हैं।तुम्हारे कपोल बिना घी लगे फुलके हैं और तुम्हारे दाँत मटरपनीर
कहीं पोपला कहीं खोखला ।”
और जी आप !!”मेरे प्यारे खोये की जलेबी हो ।”
“वास्तव में इन झिड़कियाँ में ही हमारी प्रीत बसी है हेमा जी “।
डॉ.रंजना शर्मा