पत्थर था मगर बर्फ के गालो की तरह था.
एक शख्स अंधेरों में उजालो की तरह था.
ख़्वाबों की तरह था न ख्यालों की तरह था.
वो इल्म-ए-रियाज़ी के सवालों की तरह था.
उलझा हुआ ऐसे के कभी सुलझ नही पाया.
सुलझा हुआ ऐसे के मिसालों की तरह था.
वो मिलतो गया था मगर अपना ही मुकद्दर.
शतरंज की उलझी हुई चालों की तरह था.