नदी -नाले बह जाने हैं
पर्वत- शिखर उठ जाने हैं,
भारत भूमि के बहुत संदेश
मुझे, तुम्हें दे जाने हैं।
आँगन की धूप चले जानी है
चिड़िया डाल से उड़ जानी है,
शोकगीत यहाँ क्षणभर होगा
स्नेह गीत फिर गाना होगा।
कितने मोड़ मुड़ आये हैं
कितने मोड़ फिर आयेंगे,
भारत भूमि की मिट्टी से
बहुत संदेश ले जाने हैं।
**महेश रौतेला