❤ प्रेम में हम किसी को हृदय से लगा लेते हैं। दो देह पास आ जाती हैं, लेकिन दूरी बरकरार रहती है, दूरी मौजूद रह जाती है। इसलिए हृदय से लगाकर भी किसी को पता चलता है कि हम अलग-अलग हैं, पास नहीं हो पाये हैं, एक नहीं हो पाये हैं। शरीर को निकट लेने पर भी, वह जो एक होने की कामना थी, अतृप्त रह जाती है। इसलिए शरीर के तल पर किये गये सारे प्रेम असफल हो जाते हों, तो आश्चर्य नहीं। प्रेमी पाता है कि असफल हो गये। जिसके साथ एक होना चाहा था, वह पास तो आ गया; लेकिन एक नहीं हो पाये। लेकिन उसे यह नहीं दिखायी पड़ता कि यह शरीर की सीमा है कि शरीर के तल पर एक नहीं हुआ जा सकता, पदार्थ के तल पर एक नहीं हुआ जा सकता, मैटर के तल पर एक नहीं हुआ जा सकता। यह स्वभाव है पदार्थ का कि वहां पार्थक्य होगा, दूरी होगी, फासला होगा।
लेकिन प्रेमी को यह नहीं दिखायी पड़ता है! उसे तो यह दिखायी पड़ता है कि शायद जिसे मैंने प्रेम किया है, वह मुझे ठीक से प्रेम नहीं कर पा रहा है, इसलिए दूरी रह गयी है। शरीर के तल पर एकता खोजना नासमझी है, यह उसे नहीं दिखायी पड़ता! लेकिन दूसरा--प्रेमी दूसरी तरफ जो खड़ा है, जिससे उसने प्रेम की आकांक्षा की थी, वह शायद प्रेम नहीं कर रहा है, इसलिए एकता उपलब्ध नहीं हो पा रही। उसका क्रोध प्रेमी पर पैदा होता है, लेकिन दिशा ही गलत थी प्रेम की, यह खयाल नहीं आता! इसलिए दुनिया भर में प्रेमी एक-दूसरे पर क्रुद्ध दिखायी पड़ते हैं। पति-पत्नी एक-दूसरे पर क्रुद्ध दिखायी पड़ते हैं!
सारे जगत में प्रेमी एक-दूसरे के ऊपर क्रोध से भरे हुए हैं, क्योंकि वह आकांक्षा जो एक होने की थी, वह विफल हो गयी है, असफल हो गयी है। और वे सोच रहे हैं कि दूसरे के कारण असफल हो गयी है! प्रत्येक यही सोच रहा है कि दूसरे के कारण असफल हो गया हूं, इसलिए दूसरे पर क्रोध कर रहा है! लेकिन मार्ग ही गलत था। प्रेम शरीर के तल पर नहीं खोजा जा सकता था, इसका स्मरण नहीं आता है.........?
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