शीर्षक - "नया इश्क"
प्यार, इश्क, मोहब्बत तो सदा दिल से होते हैं
दिमाग तो महज एक, साजिशों का कारखाना है।
जहां साजिशें हैं, अंजाम साफ है मुक्कमल
कहीं बुझी पड़ी शमा है और जलने को मचल रहा परवाना है।
अब तो मायने बदल रहें हैं, मोहब्बत के
नजरों में कोई और, बाहों में कोई और,
और ख्वाबों में किसी और का ठिकाना है।
बदलते वक्त के साथ, बदल रही है तजवीज़ मोहब्बत की
जहां होती थी, कभी कोशिशें मुलाकातों की
अब तो छुटकारा पाने के लिए, ढूंढ़ते बहाना हैं।
वो जमाने लद गए,
जब इश्क
"आशिकाना" था,
नए दौर का इश्क बेहद
"साजिशाना" है।