सुदंर कविता ..
इंसान कितना भी कर्म कर ले मगर ,भाग्य के आगे झुक जाना पड़ता हैं ।
धर की बुनियाद मजबूत करने के लिए ,धर का बोझ अपने हाथों उठाना पड़ता हैं ।।
लोगो की प्यास बुझाने ,सागर को बादल बन बरसना पड़ता हैं ।
जिसके पास ना हो आबरु की चादर ,उनको जीते जी मर जाना पड़ता हैं ।।
दुनियां के द्वार यूं ही नही खुलते ,संधर्षो की दीवारों से टकराना पड़ता हैं ।
नदी चाहे कितना भी लड ले पत्थरों से ,मिट्टी बन उसको बह जाना पड़ता हैं ।।
जुनून का पेड़ सीचने से पहले ,हसीन ख्वाबों का खून बहाना पड़ता हैं ।
दूसरो को अपना बनाने के लिए ,जिह्वा में मीठास लाना पड़ता हैं ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला जिला डूँगरपुर ,राजस्थान ,हाल .अमदाबाद ।