अब्र लिखती है कहीं और घटा लिखती है
रोज़ इक ज़ख़्म मेरे नाम हवा लिखती है
ज़र्द पत्तों की चमकती हुई पेशानी पर
है कोई नाम जिसे बाद-ए-सबा लिखती है ,,,,
जो मेरे नाम से मंसूब नहीं है लेकिन
वो फ़साना भी मेरा ख़ल्क़-ए-ख़ुदा लिखती है ,,,,
ऐ मेरी जान मोहब्बत भी अजब शय है कि जो
कूचा-ए-गर्द-ए-मलामत को वफ़ा लिखती है ,,,,
सुन किसी टूटे हुए दिल का वो नौहा तो नहीं
नग़्मा-ए-गुल कि जिसे दस्त-ए-सबा लिखती है ,,,,
इक तमन्ना के लिए फिरती है सहरा सहरा
ज़िंदगी रोज़ कोई ख़्वाब नया लिखती है ,,,,
शब के सन्नाटे में इक माँ की छलकती हुई आँख
अपने प्यारों के लिए हर्फ़-ए-दुआ लिखती है ,,,,
'' उस को हम सुनाते है पुरानी ग़ज़लें
वो मेरे नाम से कुछ शेर नया लिखते है,,,,