कभी-कभी हम माता-पिता को व्यक्ति मान लेते हैं,
गली से जाते हुए लोगों में शामिल,
भीड़ में खोते इंसान की तरह,
वृद्धाश्रम में रहते बाशिंदों की तरह।
अद्भुत, कोमल अनुभूतियों के आगार,
माता-पिता को हम व्यक्ति मान लेते हैं।
परिचित से अपरिचित होते हुए,
झुर्रियों और बुढ़ापे के समान देखते हैं।
कभी-कभी जब उनकी दृष्टि कम हो जाती है,
हम दृष्टिहीन हो जाते हैं,
एक आलोचक की तरह उधेड़ते-उधेड़ते,
माता-पिता को हम व्यक्ति समझ लेते हैं।
कभी-कभी हम माता-पिता को सड़क पर चलता आदमी सोच लेते हैं,
धूप में आता-जाता,
बुढ़ापे में मुरझाया
लम्बी खाँसी का प्रतिरूप,
तो कभी-कभी हम माता-पिता को हम में ही खोया
और कभी-कभी जीवित पाते हैं।
* महेश रौतेला