सुदंर रचना ..
भेज पांखुरी कुछ गुलाब की ।
तुम सारा मधुमास दे गये ।।
एक पृष्ठ ही पढ़ा तुम्हारा ।
तुम सारा इतिहास दे गये ।।
तुमसे कभी नही मिल पाया ।
इसकी नहीं शिकायत कोई ।।
जितनी दूर रहा मैं तुमसे ।
तुम उतना विश्वास दे गये ।।
यदि हम भौर सभंल कर जीते ।
इतनी जल्दी शाम न होती ।।
मेहंदी और महावर हंसता ।
गजल अधिक बदनाम न होती ।।
तट पर नाव बांधने वालों ।
यदी तुंफा से तुम लड़ लेते ।।
तो होता आकाश हाथ में ।
सफलता पैरों को चूमती ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,हाल .अमदाबाद ।