सुदंर रचना ...
विषय .नार ...
मृगनयनी सी चितवन तेरी ,सबके दिल को भा जाये प्रिये ।
कोयल सा तेरा कंठ मनोहर ,सबके मन हरषाय प्रिये ।।
अप्सरा जैसा रुप मनोहर ,सबका मन ललचाय प्रिये ।
काली धटा सी जुल्फें तेरी ,लहर लहर लहराय प्रिये ।।
चोटी तेरी नागिन जैसी ,लहर लहर बल खाय प्रिये ।
गुलाब सी है तन की खुशबु तेरी ,सबके मन महकाय प्रिये ।।
तु तो नार नवेली सी ,कामिनी सी दिल को भाय प्रिये ।
कितने करुं बखान तेरे मैं ,शारदा भी कहने से लजाय प्रिये ।।
तेरे जैसी नार ना कोई जग में ,जो सबके मन को भाय प्रिये ।
तु तो सुदंरता का खजाना है जग का ,हर किसी की आँख में बस जाय प्रिये ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,हाल .अमदाबाद ,गुजरात ।