विकसित बेबसी
कुछ दिनों से बारिश और बाढ़ ने कोहराम मचा रखा है।
न सिर्फ हमारे देश में बल्कि पूरी दुनियाँ में । और मैं बहुत दिनों से यही सोच रहा था कि हम खुद को किस बात में विकसित मानते हैं ।
लंबी लंबी सड़के बना ली ,ऊँची ऊँची इमारते खड़ी कर दी,
और तो और चाँद पर पहुँच गए । हा हा ...........
लेकिन ये क्या?? दो चार दिन की बारिश में हम , हम क्या पूरी दुनिया लाचार हो गयी है। किसी के पास कोई तरीका नही है कि प्रकृति की इस आपदा से कैसे बचा जाए ?
तो क्या समझे ,इंसान चाहे कितनी भी तरक्की कर ले , चाहे कितना भी विकास क्यों न कर ले । जब प्रकृति अपना प्रचंड रूप धारण कर लेगी तो सारे विकास सारी तरक्की बेकार हो जाएगी ।
फिर क्या फायदा विकास और तरक्की का , जब हमारे ही लोग बाढ़ में अपना सब कुछ खो देतें है, कुछ लोग सामान खो देतें हैं , कुछ लोगो का घरबार छूट जाता है, और दुख तो तब होता है जब किसी का कोई अपना इस बाढ़ में हमेशा के लिए दूर जो जाता है।।
तो फिर क्या समझे कि ये जो तरक्की और विकास की बातें करते हैं या गर्व करतें हैं , वक़्त आने पर ये बेईमान हो जाते हैं या फिर ये भी बेबस हो जातें हैं।
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चका चौंध सी थी गालियां सारी
एक और उपलब्धि का जश्न मना रहे थे
विकास और तरक्की का झूठा गुणगान गा रहे थे।
कि आ गयी एक तेज़ धारा किसी बरसात की
और बहा ले गयी खुशियाँ सारी
न विकास बचा पाया न तरक्की संभाल पायी।।
और जो समझ मे आया
वो थी विकसित बेबसी।।।
धन्यवाद