Title:- उदासी भरी शाम
उदास सांझ अब अकेले नहीं कटती,
काश अगर तुम साथ होते तो अच्छा होता ।
कर सकता था में बगावत भी अपनों के साथ,
काश अगर तुम साथ निभाते तो अच्छा होता ।
मरता रहा हर एक अंग भीतर ही भीतर मुझमें,
काश तुम्हें थोड़ा सा अहसास होता तो अच्छा होता ।
बारिश में केवल पानी ही नहीं आँसु भी थे मेरे,
काश अगर तुम नज़रे मिलाते तो अच्छा होता ।
कायनात तक जाने की बात मत करो मेरे सामने,
काश सिर्फ दिल तक पहुँच पाते तो अच्छा होता ।
नफरत का ज़हर तो पहले से ही भरा था ज़िन्दगी में,
काश तुम थोड़ा सा प्यार जता पाते तो अच्छा होता ।
दफन किया कब्रिस्तान के किसी कोने में मुझे,
काश बीच चौराहे मुझे जलाया होता तो अच्छा होता।
-अज्ञेय (निकुंज परमार)