आज वक़्त से पहले ही
जागा,
नींद से भरी आंखें
सिकुड़कर झांका
खिड़की से बाहर,
तो पाया दुनिया तो जाग चुकी है
मुझ से पहले।
वैसे मुर्गे को ऐसा है के वो
जागता है वक़्त से पहले
और वही जगाता है सबको,
इसी चक्कर में वो
जागकर फिर सो चुका था।
पड़ोस में काफी
हल्ला गुल्ला
था,
बच्चे शायद आज
स्कूल नहीं गए,
उनकी आवाज़ में घुली हुई थी चूड़ियों की खनखन
और पायलों की छमछम,
इतवार जैसी
सुबह की आवाज़ें।
पर आज इतवार है?
घड़ी अपनी उसी रफ्तार से
चल रही थी,
वैसे ही चलती है सदा,
पर सबको उसकी चाल
अलग क्यों लगती है।
आज मुझे भी ऐसे
ही कुछ लग रहा था।
वक़्त से पहले पाने की
चाहत ही सबको शायद,
दिनभर दौड़ाती है,
पर वक़्त
कहां किसी का हुआ है
और कहां
रुका है किसी के लिए।
आज भी रोज़ की तरह,
भागना तो मुझको भी है,
जानता हूं वक़्त से पहले
कभी कुछ नहीं मिलता,
पर उसकी ख्वाहिश तो कभी
मैंने भी की है,
क्या करूं, आखिर
इंसान ही तो हूं,
ख्वाहिशें ही तो होती है
जीने का सहारा, भले ही
वह हों वक़्त से पहले
- पूजन मजमुदार २४/०८/२०१९