लिखनी है ग़ज़ल पर काफ़िया न मिले तो क्या करूँ!
करवा लेता चोरी पर माफिया न मिले तो क्या करूँ!
सुना है वहाँ पेड़ है जहां लफ्ज़! मिलते है परदेश में,
मंगाना भी चाहा पर डाकिया न मिले तो क्या करूँ!
किसीने कहा कहीं बोल! बिकते है बड़े ही सस्ते में,
खरीदना भी चाहा पर रुपिया न मिले तो क्या करूँ!
चाहता हूँ ग़ज़लकार बनना, कुछ कम ही लगता है,
ढूंढता रहता हूँ, पर ख़ामियाँ न मिले तो क्या करूँ!
ग़ज़ल के लिए दर्द-ए-तन्हाई! बहोत है इस दिल में,
रोना चाहता हूँ!! पर तकिया न मिले तो क्या करूँ!
Bhavesh Parmar. आर्यम