कुदरत की हाहाकार सुन,
मन कुछ विचलित हो चला।
भूल कहाँ हो गई? हमसे,
ये प्रश्न मन में है फिर उठा।
वक्त रहते सम्भल जा तू,
करुण रुदन है प्रकृति का।
तटिनी के विरह गीत से,
छलनी हुआ धरा का कोना।
प्रण ले स्वयं से तू आज,
धरोहर को नहीं है वंचना।
विरासत में मिली संपदा को,
आगे बढ़ तुम्हें है सहेजना।
अपनी भूल से सीख कर,
सदाचार मन में सदा ही रखना।