सूनी न रह जाए कलाई
बहन तुम्हारी घर है आई ।
प्रेम तन्तु है लेकर आई ।
हाथ बढ़ाओ प्यारे भाई ।
हिंसक पशु नागर बन बैठे ।
धन-पद के मद में हैं ऐंठे ।
नारी -नर से उन्नत कैसे ।
साम्य बोध आए फिर कैसे ।
निज रक्षा प्रण हित मैं आई ।।
लोभ न कोई मन में मेरे ।
इच्छा एक है मन में मेरे ।
कुक्षि पूजन होवे घर तेरे ।
होता है सब विधि के प्रेरे ।
यदि मेरी प्रतिरूपा आयी ।।