तुम नही तो कुछ नही.......
हर बार तुम्हें ट्रेन में बिठाने के बाद जब कैब से अकेले घर लौटता हूँ तो सोचता हूँ कि अब कोई बात-बात पर टोकेगा नहीं। चाय पीने के बाद कप चाहे जब किचन में रखो, कपड़े तीन दिन तक सूखते रहें, चद्दर सिकुड़ी रहे, पूरे घर को ऐशट्रे बना लो। कोई रोकने-बोलने वाला नहीं। पर यर फीलिंग बस घर पहुंचने तक रहती है। घर का ताला खोलते ही याद आने लगता है तुम्हारा दरवाज़ा खोलते ही गले लगा लेना, तौलिया पकड़ाते हुए मुँह हाथ धोने के लिए कहना और चाय चढ़ा देना।
पहले से कोई फ़िल्म सोच कर रखना जो आज देखनी है और धीरे से किचन से एक प्लेट में गार्लिक ब्रेड और चाय लाते हुए चिल्लाना "सरप्राइज़!!" इतना बतखोर होने के बाद भी मुझे शब्द नहीं समझ आते जिनमें तुम्हें शुक्रिया करूँ इसलिए बिना कुछ बोले उठकर तुम्हें गले लगा लेता हूँ और तुम मौका देख कर पट से कोई डिमांड कर देते हो जो कई दिनों से पेंडिंग है। उस वक़्त जो हँसी आती है न मुझे, उसमें रत्ती भर भी मिलावट नहीं होती। एकदम पेवर दूध की चाय की तरह।
ये सब बातें काश फोन पर भी हो पाती, वो टेक्नोलॉजी अभी आयी नहीं है शायद और शायद आनी भी नहीं चाहिए। फोन भी नहीं होना चाहिए था, चिट्ठी-पत्री भी नहीं। यादों को बर्दाश्त कर पाने का कोई साधन नहीं। प्रेम में काम नहीं चलाना चाहिए, खुद को दिल खोल के खर्च करना चाहिए। यहाँ खर्च करने से बढ़ता है। ये मैंने तुमसे ही सीखा है। असल में मैंने प्रेम करना तुमसे ही सीखा है। मैं एक दिन इतना ही प्रेम तुमसे करना चाहता हूँ जितना तुम मुझसे करते हो।
अब घर, घर नहीं लगता। दिन तुम्हारे झूले के साथ कट जाता है। उसी पे बैठ कर सिगरेट पीते हुए तुम्हें याद करना और सोचना की काश मैं तुम्हें कह पाता कि मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ। तुम हो तो सब कुछ है, तुम नहीं तो कुछ नहीं, कुछ भी नहीं। ❤️❤️
~no buddy