मेरे महबूब तुम्हें जाने की ज़रुरत क्या थी
जब जाना ही था तो फिर आने की ज़रूरत क्या थी
कितने सुकून में था तेरे आने से पहले
जाते जाते मेर सुकून ले जाने की ज़रूरत क्या थी
तुम्हीं को तो बता रखा था जान मेरी ज़माने को
यूँ जाते जाते मेरी जान ले जाने की भी ज़रूरत क्या थी
अब हो गई हो ना तन्हा, हमारे बगैर यूँ चलते चलते
जब प्यार था ही नहीं,तो जताने की ज़रुरत क्या थी....!