चलो ढूँढते हैं।
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“चलो तो फिर” आशियाना ढूँढते हैं।
जीने का कोई और बहाना ढूँढते हैं।।
दिल से दिलों की दूरी ना हो।
जीने की कोई मजबूरी ना हो।।
ना निज से गिला ना औरों के सितम,
कोई अपना ना हुआ बेगाना ढूँढते हैं।।
चलो तो फिर” आशियाना ढूँढते हैं।
तेरा साथ है तो फिर क्या फ़िकर।
तू ही है सुख क्या सुख का जीकर।।
हम ख़ुद बेख़बर पर है औरों की नज़र,
अब अपनी नज़र का ठिकाना ढूँढते हैं।
चलो तो फिर” आशियाना ढूँढते हैं।
गालियाँ वो ढूँढो जो दे दें सुकून।
दीवारें सफ़ा हों न बिखरा हो ख़ून।
ना छूरी ना ख़ंजर न आँखों में नफ़रत,
जो जीना सिखाए वो ज़माना ढूँढते हैं।
चलो तो फिर” आशियाना ढूँढते हैं।
दीपक जैन —-निर्मल